History of Jahangir:

अकबर का उत्तराधिकारी नुरुद्दीन मोहम्मद सलीम हुआ जिसे “दुनिया जीतने वाला” भी कहा जाता है। Jahangir को भारतीय इतिहास में महान मुग़ल सम्राट की उपाधि प्राप्त है और वह मुग़ल काल के चौथे महान सम्राट थे। इसलिए History of Jahangir एक बहुत ही Important Part बन जाते हैं।

Jahangir का इतिहास में “न्याय की जंजीर”  के लिए याद दिया जाता है क्योंकि जंजीर सोने की बनी थी, जो आगरे के किले के शाहबुर्ज एवं यमुना-तट पर स्थित पत्थर के खम्बे में लगवाई हुई थी। इसके अलावा History of Jahangir में “अनारकली” की भी अहम भूमिका थी क्योंकि इतिहास के अनुसार जहाँगीर का सम्बन्ध अनारकली के साथ था। उनके इस रिश्ते को इतिहास में, साहित्य में और भारतीय सिनेमा में बहुत ही अच्छी तरह से दर्शाया गया है।

Jahangir

जहाँगीर, अकबर के सबसे बड़े पुत्र थे और उनका जन्म 30 August 1569 ई. में हुआ था। अकबर ने अपने पुत्र का नाम सलीम सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के नाम पर रखा था।

Jahangir बचपन से ही बहुत उत्सुक प्रवृत्ति के थे इसी कारण उनके अंदर राज गद्दी पर बैठने की भी उत्सुकता है जब 1599 ई में अकबर डेक्कन में व्यस्त थे तब जहाँगीर ने अपने पिता की विरुद्ध विद्रोह कर दिया था जिसमे जहाँगीर की हार हुई थी लेकिन Jahangir 1605 ई में राज गद्दी पर बैठने में सफल हो गए

इतिहास के अनुसार जहाँगीर के राजगद्दी पर बैठने और अकबर से गद्दी को छीनने में अकबर के हरम में मौजूद औरतों का हाथ था जिनमे रुकैया सुलतान बेगम, सलीमा सुल्तान बेगम और उनकी दादी मरयम मकानी सम्मिलित थे।

इस प्रकार जहाँगीर राजगद्दी पर बैठा लेकिन पहले ही वर्ष उसके बड़े पुत्र “खुसरो मिर्जा” ने बगावत  कर दी लेकिन खुसरो मिर्जा को जल्द ही झुकना पड़ा और जहाँगीर ने उसे बंदी बना लिया था।

जहाँगीर को गद्दी पर बैठने के उपरान्त अपार संपत्ति भी मिली थी जिसमे असंख्य सैनिक बल, मजबूत आर्थिक परिस्तिथि, और शक्तिशाली योद्धा थे। जिसके बल पर जहाँगीर ने अपने साम्राज्य का विस्तार बंगाल, मेवार के बाद डेक्कन की ऒर बढ़ता गया उस समय एक ही शक्तिशाली परिवर्तन हुआ जब 1622 ई. में शाह अब्बास ने ख़ानदार को अपनी हिरासत में ले लिया था।

उस समय जहाँगीर हिन्दुस्तान में खुर्रम से युद्ध कर रहे थे। जहाँ जहाँगीर के सैन्यबल के आगे खुर्रम कुछ नहीं कर सका और उसे मैदान छोड़ना पड़ा। इतिहास कारों के अनुसार जहाँगीर हिन्दू राजाओं और राजपूतों के साथ बहुत ही अच्छा व्यवहार करते थे और उनके साथ अपने रिश्तों को मजबूत करने की कोशिश भी किया करते थे।

जहाँगीर एक विशाल, शक्तिशाली और बहादुर मुग़ल सम्राट था। वह एक ऐसा शासक था जिसने अपने राजकाल में जाति-धर्म में भेदभाव नहीं किया बल्कि दुसरे राज्य के लोग उनसे प्रेरणा लेते थे की महाराज बिलकुल जहाँगीर के जैसा ही होना चाहिए क्योंकि जहाँगीर का साम्राज्य विशाल, शक्तिशाली और मजबूत था।

Jahangir (जहाँगीर) से सम्बंधित Important Points

अकबर का उत्तराधिकारी सलीम हुआ, जो 3 November, 1605 ई. को नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर बादशाही गाजी की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठा था।

Jahangir (जहाँगीर) का जन्म 30 August, 1569 ई. को हुआ था।

अकबर ने अपने पुत्र का नाम सलीम सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के नाम पर रखा था।

Jahangir (जहाँगीर) को न्याय की जंजीर के लिए याद किया जाता है। यह जंजीर सोने की बनी थी, जो आगरे के किले के शाहबुर्ज एवं यमुना-तट पर स्थित पत्थर के खम्बे में लगवाई हुई थी।

जहाँगीर द्वारा शुरू की गई ‘तुजुके-ए-जहाँगीरी’ नामक आत्मकथा को पूरा करने का श्रेय “मोतबिंद” खां को है।

Jahangir (जहाँगीर) के सबसे बड़े पुत्र खुसरो ने 1606 ई. में अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। खुसरो और जहाँगीर की सेना के बीच युद्ध जालंधर के निकट भैरवाल नमक मैदान में हुआ था। खुसरो को पकड़कर कैद में डाल दिया गया था।

खुसरो की सहायता देने के कारण Jahangir (जहाँगीर) ने सिक्खों के 5वें गुरु अर्जुनदेव को फाँसी दिलवा दी। खुसरो गुरु से गोइंदवाल में मिला था।

अहमदनगर के वजीर मालिक अम्बर के विरुद्ध सफलता से खुश होकर Jahangir (जहाँगीर) ने ख़ुर्रम को शाहजहां की उपाधि प्रदान की थी।

1622 ई. में कंधार मुगलों के हाथ से निकल गया, शाह अब्बास ने इस पर अधिकार कर लिया था।

नूरजहाँ- ईरान निवासी मिर्जा गयास वेग की पुत्री नूरजहाँ का वास्तविक नाम मेहरुन्निसा था। 1594 ई. में नूरजहाँ का विवाह अलीकुली बेग के साथ संपन्न हुआ था। Jahangir (जहाँगीर) ने एक शेर मारने के कारण अली कुली बेग को शेर अफगान की उपाधी प्रदान की गयी थी। 1607 ई. में शेर अफगान की मृत्यु के बाद मेहरुन्निसा अकबर की विधवा सलीम बेगम की सेवा में नियुक्त हुई। सर्वप्रथम Jahangir (जहाँगीर) ने नवरोज त्यौहार के अवसर पर मेहरुन्निशा को देखा और उसके सौंदर्य पर मुग्ध होकर जहाँगीर ने मई, 1611 में उससे विवाह कर लिया। विवाह के पश्चात जहाँगीर ने उसे नूरमहल एवं नूरजहाँ की उपाधि प्रदान की थी।

जहाँगीर ने गियास वेग को शाही दीवान बनाया एवं इतमाद-उल-दौला की उपाधि दी थी।

लाड़ली बेगम शेर अफगान एवं मेहरुन्निसा की पुत्री थी, जिसकी शादी Jahangir (जहाँगीर) के पुत्र शहरयार के साथ हुई थी।

नूरजहाँ की माँ अस्मत बेगम ने गुलाब से इत्र निकालने की विधि खोजी थी।

महावत खां ने झेलम नदी के तट पर 1626 ई. में जहाँगीर, नूरजहाँ एवं उसके भाई आसफ खां को बंदी बना लिया था।

Jahangir (जहाँगीर) के पाँच पुत्र थे- (1) खुसरो, (2) परवेज, (3) खुर्रम, (4) शहरयार एवं (5) जहाँदार थे।

7 November, 1627 ई. को भीमवार नामक स्थान पर Jahangir (जहाँगीर) की मृत्यु हो गयी थी। उसे शहादरा (लाहौर) में रावी नदी के किनारे दफनाया गया था।

मुग़ल चित्रकला अपने चरमोत्कर्ष पर जहाँगीर  शासनकाल में पहुंची थी।

Jahangir (जहाँगीर) के दरबार के प्रमुख चित्रकार थे- आगा रजा, अबुल हसन, मुहम्मद नासिर, मुहम्मद मुराद, उस्ताद मंसूर, विशनदास, मनोहर एवं गोवर्धन, फारुख बेग, दौलत इत्यादि थे।

Jahangir (जहाँगीर) ने आगा राजा के नेतृत्व में आगरा में एक चित्रणशाला की स्थापना की थी।

उस्ताद मंसूर एवं अबुल हसन को Jahangir (जहाँगीर) ने क्रमशः नादिर-अल-उस एवं नादिरुज्जमा की उपाधि प्रदान की थी।

Jahangir (जहाँगीर) ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि कोई भी चित्र चाहे वह किसी मृतक व्यक्ति या जीवित व्यक्ति द्वारा बनाया गया हो, मै देखते ही तुरंत बता सकता हूँ कि यह किस चित्रकार की कृति है। यदि किसी चेहरे पर आँख किसी एक चित्रकार ने, भौह किसी और ने बनाई हो, तो भी यह जान लेता हूँ कि आँख किसने और भौह किसने बनायीं है।

Jahangir (जहाँगीर) के समय को चित्रकला का स्वर्णकाल कहा जाता है।

इत्माद-उद-दौला का मकबरा 1626 ई. में नूरजहाँ बेगम ने बनवाया था। मुगलकालीन  वास्तुकला के अंतर्गत निर्मित यह प्रथम ऐसी ईमारत है, जो पूर्णरूप से बेदाग, सफ़ेद संगमरमर से निर्मित है। सर्वप्रथम इसी ईमारत में पित्रदुरा नामक जड़ाऊ का काम किया गया था।

अशोक के कौशाम्बी स्तम्भ (वर्तमान में प्रयाग) पर समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति तथा जहाँगीर का लेख उत्कीर्ण हैं।

Jahangir (जहाँगीर) के मकबरे का निर्माण नूरजहाँ ने करवाया था।

Jahangir (जहाँगीर) के शासन काल में कैप्टन हाकिंस, सर टॉमस रो, विलियम फिंच एवं एडवर्ड टैरी जैसे यूरोपीय यात्री आये थे।

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